श्री सूर्य चालीसा - Shree Surya Chalisa
जयति सूर्य नारायण स्वामी। करहु कृपा प्रभु अन्तर्यामी ॥
#CHALISA
9/27/2024
श्री सूर्य चालीसा
॥ दोहा ॥
श्री गणपति पद कमल महँ, प्रेम सहित धरि ध्यान ।
सूरज चालीसा कहौं, द्रवौ दया करि नाथ ॥
जय दिनकर जय दिवाकर, दीनदयाल दिनेश।
जय जग पालक प्रभाकर, कीजै हरण कलेश ॥
॥ चौपाई ॥
जयति सूर्य नारायण स्वामी।
करहु कृपा प्रभु अन्तर्यामी ॥
अगन कांति धर गगन बिहारी।
अनुपम ज्योति कला छबि न्यारी ॥
युग सहस्त्र योजन तनु राजै ।
माथे कनक मुकुट-मणि साजै ॥
कुण्डल कलित कपोलन सोहै।
सो लखि तेज तेज-पति मोहै ॥
श्वेत वर्ण षट्-दश हय नाधे।
अरुण सारथी रजु कर-साधे ॥
नौ लख योजन रथ चौड़ाई।
सो छत्तीस लक्ष लम्बाई ॥
रत्न जड़ित रथ पर प्रभु राजित।
लखि गति सहस चंचला लाजित ॥
नौ करोड़ इक्यावन लाखा।
परिक्रमा रवि की श्रुति भाखा ॥
अगणित दैत्य नित्य संहारहिं।
जग भक्तन कर कष्ट निवारहिं ॥
उदय होत निशि कहँ तम भाजै।
तब सतयुग कर डंका बाजै ॥
धनि हो धन्य भानु भगवाना।
तब महिमा प्रत्यक्ष बखाना ॥
तेजराशि अतुलित बल धारी।
तब महिमा वरणत त्रिपुरारी ॥
सुनहु उमा शुभ चरित दिनेशा।
सकल हरण जन कष्ट कलेशा ॥
कुष्ट वरण जिनके तन होई।
रवि पर ध्यान धेरै नित जोई ॥
व्रत बिनु लोन करै रविवारा।
ब्रह्मचर्य युत धारि विचारा ॥
द्विज सन रविकर सुनै पुराना।
पूजन करै राखि उर ध्याना ॥
हवन कराइ धेरै मन धीरा।
सोइ भस्म लै मलै शरीरा ॥
निश्चय छूटै कुष्ट कलेशा।
ऐसे दीन दयालु दिनेशा ॥
अन्धहु प्रभु महँ ध्यान लगावै ।
निश्चय दिव्य दृष्टि को पावै ॥
जो निश्चय कर प्रेम प्रतीती।
निशदिन रवि पर धारै प्रीती ॥
रवि दिन प्रेम सहित चित लाई।
सूर्य पुराण सुनै सुखदाई ॥
करै नेम द्वादश रविवारा।
रहे लोन बिनु एक अहारा ॥
करै शयन कुश कास डसाई।
हर्षित सदा सूर्य गुण गाई ॥
जो अस प्रभु महँ ध्यान लगावै ।
बन्ध्यहु नारि पुत्र सुख पावै ॥
कह शिव संशय करै न कोई।
सत्य वचन मम मृषा न होई ॥
जग हित लागि प्रेम रस बानी।
मुनि अस गौरि हृदय हर्षानी ॥
धन्य-धन्य सूरज अघनाशी।
दीन दयानिधि मंगल राशी ॥
महा अधिन कहँ तारण वाले ।
नारद शाप निवारण वाले ॥
सत्राजित के मान रखैया।
मणि ते स्वर्ण मेह वर्षेया ॥
प्रात रूप धारे चतुरानन ।
राजे तवण विष्णु रूप मध्यानन ॥
शम्भु रूप धरि सायंकाला।
त्रिभुवन माहि करै प्रति पाला ॥
वर्ष बीच पुनि बारह नामा।
धरि भक्तन कर पूजहि कामा ॥
षट ऋतु दिन तिथि वर्ष महीना।
पलक मुहूर्त तुम्हें आधीना ॥
खग मृग जीव जन्तु नर नारी।
घन गर्जत नभ वर्षत बारी ॥
वृक्ष लतादिक प्रभु तव जानत।
फूलत फरत झरत पुनि जामत ॥
चन्द्रादिक नवग्रह नभ तारें।
ये सब तुम्हरहि नाथ सहारें ॥
धन्य सूर्य नारायण स्वामी।
दिव्य दृष्टि दै अन्तर्यामी ॥
करहु वेगि अब पूरण आशा।
होइ हृदय मम ज्ञान प्रकाशा ॥
जो यह चरित सूर्य को गावै ।
सब सुख भोग परम पद पावै ॥
नमत राम सुन्दर प्रभु दासा ।
लग प्रयाग आश्रम दुर्वासा ॥
॥ दोहा ॥
रवि चालीसा प्रेम युत, पाठ करे धरि ध्यान।
सुख सम्पत्ति आयु बढ़े, होई सदा कल्यान ॥


